विश्व आदिवासी दिवस विशेष | जल, जंगल और ज़मीन के सिरमौर आदिवासी, परंपरा और सभ्यता के लिए जान न्योछावर करने वाला समुदाय

  • Amazing Fact About Dindori | डिंडौरी जिले के 927 गांवों में से 899 गांवों में निवासरत हैं विभिन्न जनजातियां



रामकृष्ण गौतम/भीमशंकर साहू | डिंडौरी


मध्यप्रदेश के संपन्‍न और समृद्ध आदिवासी जिलों में से एक डिंडौरी जिला विशेष जनजातीय कलेवर के लिए पहचाना जाता है।जिले में आदिवासियों का इतिहास सदियों पुराना है। आज (09 अगस्त) विश्व आदिवासी दिवस पर डिंडौरीडॉटनेट आपके सामने जिले की जनजातियों की अनोखी छवि प्रस्तुत कर रहा है। कलेक्टोरेट से प्राप्त सरकारी आंकड़ों के अनुसार डिंडौरी के 927 गांवों में से 899 गांवों में विभिन्‍न जनजातियां निवास करती हैं। हर जनजाति की अपनी खास पहचान, सभ्यता, संस्कार, आस्था, मान्यता, कला एवं संस्कृति है। ये लोग सदियों से जल, जंगल और ज़मीन के अधिपति रहे हैं, जो अपनी परंपराओं को निर्बाध रूप से आगे बढ़ा रहे हैं। इनका प्रकृति से नाता ठीक वैसा ही है, जैसा एक नवजात शिशु का अपनी माता से होता है। जिले के आदिवासी युवा देश-दनिया में क्षेत्र की सभ्यता और संस्कारों को प्रचारित कर रहे हैं। प्रशासन, राजनीति, खेल, गीत-संगीत, पत्रकारिता आदि क्षेत्रों में डिंडौरी में जन्मे आदिवासी उच्च पदों पर काम कर रहे हैं। 



प्रकृति से इतना लगाव कि ज़मीन पर हल नहीं चलाते आदिवासी 


इंडियन काउंसिल फॉर हिस्टॉरिकल रिसर्च (ICHR) नई दिल्ली के डिप्टी डायरेक्टर डॉ. सौरभ कुमार मिश्र ने डिंडौरी जिले के बैगाचक सहित र्दजनाें आदिवासी गांवों में रहकर Phd के लिए शोध किया है। उन्होंने बताया कि जिले में ऐसे कई जनजातीय समूह निवास करते हैं, आज भी प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर हैं। ये प्रकृति को मां मानते हैं, इसलिए धरती पर न हल चलाते हैं, न ही फसलों को नष्ट करने के लिए आग लगाते हैं। जिले के निकटवर्ती खपरी पानी गांव के कुछ बैगा जनजाति समूह धरती पर न हल चलाते हैं, न ही फसलों को नष्ट करने के लिए आग लगाते हैं। उनका मानना है कि धरती हमारी माता है और मां पर हल चलाने से उन्हें कष्ट होगा। वो कहते हैं कि जंगलों में जीवन की आवश्यकता के लिए सभी आवश्यक तत्व विद्यमान हैं इसलिए जंगल व जमीन का संरक्षण हमें करना चाहिए क्योंकि ये हमारा संरक्षण करते हैं। जनजातीय समुदाय के जीवनचर्या से संबंधित अधिकतर वस्तुएं वनों से प्राप्त होती हैं। साथ ही प्रचुर मात्रा में जीवनदायी औषधियाँ भी प्राप्त होती हैं। जनजातीय समूह स्वयं ही औषधि चुनकर अपना उपचार करते हैं। जैसे सफेदमुसली, गिलोय, सहजीरा, सौंफ, हल्दी, हड़जुड़ी, कुरकुट, पीपल, पाकड़, पलारा, पलारा, गुल्लर, आक, जरीया आदि ऐसे पौधे व वृक्ष हैं, जिससे जनजातीय समाज छोटी से लेकर बड़ी बीमारियों का इलाज करते हैं। वन आदिवासियों लिए देवतुल्य हैं और इनके संरक्षण के लिए जनजातियां हर संभव प्रयास करती हैं। 



  • डिंडौरी जिले की जनजातियों में गोदना की प्राचीन परंपरा है। उनका मानना है कि मृत्यु के बाद भी यह चिह्न साथ रहता है। गोदना बबूल या अन्य पारंपरिक उपकरण के गोदा जाता है। इससे होने वाला दर्द कम करने के लिए मालवन वृक्ष का रस लगाया जाता है। रमतिला के रस, भिलवां आदि से शरीर पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों को कम किया जाता है।



गाड़ासरई के लेखक डॉ. विजय चौरसिया ने बैगाओं को कहा ‘प्रकृति पुत्र’ 


डिंडौरी जिले के गाड़ासरई के लेखक डॉ. विजय चौरसिया ने जनजातियों पर केंद्रित पुस्तक ‘प्रकृति पुत्र बैगा’ लिखी है। उनका मानना है कि बैगा जनजाति को सच्चे अर्थों में प्रकृति का पुत्र या जंगल का राजा कहा जाना चाहिए क्योंकि वे हमेशा से प्रकृति के उपासक और संरक्षक रहे हैं। उनका मानना है कि बैगाओं की उत्पत्ति की कहानी ही प्रकृति के काफी करीब है। प्रख्यात समाजशास्त्री व मानवशास्त्री डॉ. रसेल व हीरालाल का मानना है कि बैगाओं की उत्पत्ति का तो कोई प्रमाण तो नहीं लेकिन प्रारंभ में भगवान ने नागा व नागी बैगा/बैगाइन की उत्पत्ति की, जो जंगल में प्रकृति के बीच रहने लगे। कुछ समय बाद उनसे दो संतानें पैदा हुईं, जिसमें एक बैगा था। वह प्रकृति के बीच उत्पन्न होने के कारण प्रकृति के प्रति उत्तरदायी हुआ। बैगाओं की उत्पत्ति के संबंध में कुछ अन्य मिथक भी प्रचलित हैं।




धरती से अनोखा रिश्ता | प्रकृति से लेते अन्न और औषधि, बदले में संपूर्ण जीवन अर्पण


आज के दौर में मनुष्य को भी समझ में आने लगा है कि उसने पर्यावरण का आवश्यकता से अधिक शोषण किया है। लेकिन इस दोहन व शोषण के भाव में धरती पर एक समूह ऐसा भी है, जो आज भी प्रकृति-धरती को माता मानकर आवश्यक संसाधनों के साथ अपना जीवन-यापन कर रहे हैं। इस भाव को डिंडौरी जिले के जनजातीय क्षेत्रों में अनुभव किया जा सकता है। इसी आधार पर कहना चाहूंगा कि आदिवासी प्रकृति प्रेमी व पर्यावरण के सच्चे उपासक होते हैं। प्रकृति ही उनका परिवेश, आलम्बन व उद्दीपन भी है। आदिवासी लोग प्रकृति से अन्न व औषधि ग्रहण करते ही हैं, साथ में शृंगार के लिए उपकरण और इसी के साथ अपने त्योहार भी मनाते हैं। बदले में आदिवासी प्रकृति को अपना पूरा जीवन समर्पित कर देते हैं।


- फूलचंद उइके, एसोसिएट प्रोफेसर, गवर्नमेंट चंद्रविजय कॉलेज, डिंडौरी



आदिवासियों की पहचान | परंपरा और संस्कृति की कसौटी पर सदियों से कायम 


प्राचीन परंपराएं और संस्कृति सदियों से आदिवासियों की पहचान रही हैं। अपनी सभ्यता पर जनजातीय समूह हमेशा से कायम हैं। हालांकि समय के साथ कुछ चीजें अब विलुप्त होती जा रही हैं। पहले जब भी देवी-देवताओं की पूजा की जाती थी, अगरबत्ती की जगह रार का धूप दिया जाता था। शादी-विवाहों में पंडितजी नहीं बल्कि दवार विवाह संपन्न कराते थे। आदिवासियों के देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना में भैंस के पड़ा की सींग का तुर्रा से बना वाद्य बजाया जाता था। तब जनजातियों में शंख का प्रचलन नहीं था। देवस्थलों में दुर्लभ बाना कठला चढ़ाया जाता था। शादी-विवाहों में नात-गोत्र का विशेष महत्व होता था, जो आज के समय में विलुप्त होता दिख रहा है।


- थानी सिंह धुर्वे, ब्लाॅक अध्यक्ष, गोंड महासभा, शहपुरा (डिंडौरी)


संयुक्त राष्ट्र संघ की पहल पर 1982 में शुरू हुआ सफर 


विश्व आदिवासी दिवस की संकल्पना सर्वप्रथम आज से 38 साल पहले तैयार की गई थी। 9 अगस्त 1982 को संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएनओ) की पहल पर मूलनिवासियों का पहला सम्मेलन हुआ था। इसके बाद 1994 में विश्व आदिवासी दिवस (International Day of the World’s Indigenous Peoples) मनाने का विचार प्रस्तुत किया गया। वर्तमान में भारत और बांग्लादेश समेत कई देशों में यह दिन खास तौर पर मनाया जाता है। विश्व के तमाम आदिवासियों का अंतरराष्ट्रीय दिवस पहली बार संयुक्त राष्ट्र की महासभा की ओर से दिसंबर 1994 में घोषित किया गया। इसे हर साल विश्व आदिवासी लोगों (1995-2004) के पहले अंतरराष्ट्रीय दशक के दौरान मनाया जाता है। साल 2004 में असेंबली ने अ डिकेड फाॅर एक्शन एंड डिग्निटी थीम से 2005-2015 से दूसरे अंतरराष्ट्रीय दशक की घोषणा की। 


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